Saturday, December 20, 2008

राही

ज़िन्दगी के पथ पर चलते चलते, राही तू कभी भटकना नही|
बस लक्ष्य की तरफ़ ही बढ़ते रहना, राही तू कभी थकना नही|
तो क्या हुआ अंधकार अगर है, सुबह फ़िर उजियाली होगी ,
तो क्या हुआ पतजध अगर है, वसंत में फ़िर हरियाली होगी|
निरंतर कर्म तू करता चल, पुण्य का गढा तू भरता चल,
देख इस संसार के सुख तू मत मचल, देख लक्ष्य होने न पाए ओझल|
निगाहें हो सदा तेरी मंजिल पर, पलक भी तू कभी ज्हपकना नही,
ज़िन्दगी के पथ पर चलते चलते, राही तू कभी भटकना नही|


तू बन मत वह लहर जो उठ के ऊंचा, तट पे आते ही बिखर जाती है,
तू बन मत वह मोम जो ज़रा से गर्मी, पते ही पिघल जाते है|
बन सके तो बन वह मशाल, जो जल के भी अपनी मंजिल को पाते है|
हो सके तो दूसरो की भी रहो में तू आशा भर दे,
उनमे भी लक्ष्य को पाने की रही तू अभिलाषा भर दे|
समय की रेत फिसल रही है, रहो में तू फिसलना नही,
बस लक्ष्य की तरफ़ ही बढ़ते रहना, राही तू कभी थकना नही|

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